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बेहतर जिओ !

विचार

लाएं व्यक्तित्व में निखार, पाएं मनचाहा रोजगार

दिनांक: 2014-11-19
लेखक: कैलाश चन्द्र शर्मा

जैसा व्यक्तित्व वैसा काम और जैसा काम वैसा दाम । बादल और बारिश में जो सम्बन्ध है, वही संबंध पर्सनालिटी और प्लेसमेंट में भी है। व्यक्तित्व विकास एक ऐसा ढोल है जिसे पीट-पीटकर लोगों ने फोड़ दिया है । नीम-हकीम खतरा-ए-जान यानी अयोग्य प्रशिक्षकों ने व्यक्तित्व विकास कार्यक्रम को ही बदनाम कर दिया है । इस काम में जो नज़ाक़त-नफासत है अत्यंत कम लोगों के बस की है । व्यक्तित्व विकास को सचमुच अंजाम देने लायक प्रशिक्षक स्वयं सौम्य और मोहक व्यक्तित्व के धनी होते हैं । और हों भी क्यों नहीं, ज्योत से ज्योत जलती है । सुयोग्य प्रशिक्षकों के पास ज्ञान की शक्ति, कर्म की युक्ति व प्रेमपूर्ण समझ की त्रिवेणी होती है । उनकी वाणी में ओज, चेहरे पर तेज, चाल में आत्मविश्वास, व्यवहार में दृढ़ता, संस्कारों में नम्रता का दुर्लभ संयोग तथा स्पष्टता से उत्त्पन्न विचारों में सृजनात्मकता (creativity) होती है ।

व्यक्तित्व विकसित करना एक महा ललितकला है यानी मेगा फाइन आर्ट । ललितकला में निपुण एक कलाकार यानी चित्रकार जब अपनी तुलिकाओं से एक पोर्ट्रेट यानी व्यक्ति चित्र बनाता है तो उसके एक-एक स्ट्रोक से चित्र अलग-अलग रूप ले लेता है। एक स्ट्रोक से हँसता व्यक्ति उदास दिखने लगता है तो उदास चेहरा खिल उठता है । ठीक उसी प्रकार व्यक्तित्व विकास के निपुण प्रशिक्षक के सधे प्रयासों से ही संतुलित व्यक्तित्व निखरता है । यह मार, छैनी की मार होती है । ऐसी छैनी जो हर आवश्यक हिस्सा छोड़कर अनावश्यक हिस्सा काट फेंके । यह पैनी छैनी एक अनुभवी सृजक के हाथों की शोभा है तो गलत हाथों में बन्दर के हाथों में उस्तरा । अपने व्यक्तित्व विकास हेतु सुयोग्य प्रशिक्षक के मिलने तक “आत्म दीपो भव” के अनुसार स्वयं सुधार हेतु निम्न बिन्दुओं पर ध्यान दें: रूप यानी बाह्य व्यक्तित्व, रंग यानी काया के अनुसार वस्त्रों का रंग, उम्र के अनुसार केशभूषा आदि, सम्प्रेषण कौशल, सोच और दृष्टिकोण, मूल्य व सिद्धांत, गुण-अवगुण एवं आदतें, शिष्टाचार, लक्ष्य की स्पष्टता, स्वास्थ और शरीर सौष्ठव । अगर एक सजीला-धजीला, सुन्दर, स्वस्थ युवक घबराता-हकलाता व अटक-झटककर बात करता है तो सारी सुन्दरता में शून्य का गुणा हो जाता है । व्यक्ति अगर अच्छा और मीठा ही बोले पर विचार खोखले तथा नक़ल किये हों तो जीती बाज़ी हार जायेगा । उन्नत सोच, प्रखर विचार, तथा ज्ञान कि प्रामाणिकता व्यक्तित्व के सुदृढ़ आधार हैं । व्यक्तित्व विकास के नाम पर सिर्फ ग्रुप डिस्कशन या साक्षात्कार सिखा कर ही अपने कर्त्तव्य की इतिश्री नहीं कि जा सकती । इसका अर्थ है समझदार, संवेदनशील, स्वस्थ, सुदर्शन, प्रसन्नचित्त, सेवाभावी तथा उत्तरदायी नागरिकों का निर्माण । जब प्रशिक्षक का प्रेम ‘माँ’ के प्रेम की तरह निर्मल, निःस्वार्थ तथा निष्कपट होता है, तभी होता है संस्कारों के गर्भ से व्यक्ति का व्यक्तित्व के रूप में पुनर्जन्म या दूसरा जन्म । ऐसा प्रेम ही व्यक्तित्व पर छाई जड़ता को गतिशीलता में बदल पाता है ।

कबीर यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहिं ।
शीश उतारो भुई धरो, फिर पैठों घर माहि ।।



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