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बेहतर जिओ !

विचार

खुल कर जिएं, न कि दबाव में

दिनांक : 2018-10-08
लेखक : कैलाश चन्द्र शर्मा

दरअसल हममें से अधिकतर लोग दबाव में जीते हैं। जो दबाव हमें अपने सहपाठियों और सहकर्मियों यानी साथ पढ़नेवालों और साथ में काम करनेवालों से मिलता है उसे “पीर प्रेशर” कहा जाता है और यह प्रेशर हमें खुलकर नहीं जीने देता है। हम दिन-रात व्यर्थ की तुलना में लगे रहते हैं, और लोगों द्वारा दिए गए दबाव को झेलते रहते हैं।

कोई हमें हमारे कपड़ों या मेकअप के बारे में कुछ कह देता है, और हम उस टिप्पणी यानी कमेंट को बहुत ज्यादा सीरियसली ले लेते हैं। हम लगातार यह सोचते रहते हैं कि उसने जो भी हमें कहा उसमें कुछ न कुछ तो दम है और हम उसके द्वारा चाहे गए परिवर्तनों को अपने भीतर जबरदस्ती लाने की कोशिश करते हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी ने हमें कह दिया कि फलां-फलां टी-शर्ट हम पर फबता नहीं हैं तो हम उस टी-शर्ट को पहनाना ही बंद कर देते हैं भले ही वह कितना भी क़ीमती, अच्छा, और ब्रांडेड टी-शर्ट क्यों न हो। अब आप ही बताइए क्या उस व्यक्ति के द्वारा दिए गए दबाव में किसी समझदार इंसान को आना चाहिए? नहीं ना? पर फिर भी हम दबाव में आ जाते हैं और अपने खुद के डिसिज़न को ग़लत मान बैठते हैं। सच्चाई यह है कि किसी एक व्यक्ति की राय में वही टी-शर्ट बुरा है, तो किसी दूसरे की राय में अच्छा है, किसी तीसरे की राय में बहुत ही अच्छा है। और हम हैं कि एक ही व्यक्ति की राय को फ़ाइनल यानी अंतिम मानकर उस अच्छे खासे टी-शर्ट को अलमारी के हवाले कर देते हैं।

इसी तरह जब हम कोई खास प्रकार का कोर्स ऑफ स्टडी यानी पढ़ाई का विषय या पाठ्यक्रम चुनते हैं तब भी इसी प्रकार की बिन बुलाई टिप्पणियां फालतू के राय साहब हमें मुफ्त में देते फिरते हैं। वे हमें समझाते हैं कि हमें भी उनकी तरह विषय चुनना थे और वे गिनाते हैं उन तमाम फ़ायदों को जो हमें उनके द्वारा सुझाए गए कोर्स लेने से मिल सकते हैं। हममें से अधिकांश लोग उस बहकावे में आ जाते हैं क्योंकि हमारे भीतर भी कहीं न कहीं एक अंतर्द्वंद यानी इनर कॉन्फ्लिक्ट चल रहा होता है कि कहीं मेरे द्वारा लिए गए सब्जेक्ट्स ग़लत तो नहीं हैं और इसी वजह से हम उस बहकावे का शिकार बन जाते हैं। इस सारी प्रक्रिया में हम यह भूल ही जाते हैं कि सामनेवाला व्यक्ति, उसकी परिस्थिति, उसकी सीमाएं, उसका बेकग्राउंड हमसे बिल्कुल अलग है, जब हम अलग हैं, और वे अलग हैं तो हमारे रास्ते एक कैसे हो सकते हैं, और सबसे बड़ी बात वे लोग कोई प्रोफेशनल करियर काउंसलर तो नहीं हैं जो हमें फ़ीस लेकर विधिवत सलाह दे रहे हैं। मान न मान मैं तेरा मेहमान की तर्ज पर वे हमारी ज़िन्दगी में बिना वजह घुस आते हैं और उन घुसपैठियों को हम बिना वजह तवज्जो देकर अपना नुकसान कर बैठते हैं।


क्या हक है किसी और को हमारी ज़िन्दगी के निर्णय लेने का और चलो एक बार मान भी लिया जाए कि किसी ने ऐसी हिमाकत कर दी है तो क्या ज़रूरत है हमें उनकी बताई गई बातों को गंभीरता से लेने की? कोई भी ऐरा-गेरा नत्थू खेरा हमें आकर खैरात में एक राय बांट देता है और हम उस राय को एक एक्सपर्ट राय मान लेते हैं। चाहिए तो यह कि हम सामनेवाले को साफ-साफ कह दें कि हम फुटबॉलर हैं न कि फुटबॉल। अगर हम ऐसा न भी करें तो कम से कम उनकी बात को एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल सकते हैं, और अपनी ज़िन्दगी को परेशानी से बचा सकते हैं।

यहां एक और बात दिलचस्प है और वह यह है कि जितने मुंह उतनी बातें। जो हमें सलाह देते हैं वे लोग आपस में एक राय नहीं होते हैं। कोई कहता है इधर जाओ, कोई कहता है उधर जाओ, कोई कहता है कहीं न जाओ बस बैठे रहो, और कोई अन्य व्यक्ति हमें दौड़ने को कहता है। अब हम क्या करें, किसकी बात मानें ? और इस परिस्थिति में हम लोग धर्म-संकट का शिकार हो जाते हैं, अनिर्णय का शिकार हो जाते हैं, और अपनी अच्छी सी ज़िन्दगी खराब कर देते हैं। कई दिनों तक हम “क्या करूं, क्या न करूं?” की दुविधा में फंसे रहते हैं और संभावना यह बन जाती है कि हम ग़लत निर्णय ले लें जिस के लिए बाद में बहुत पछताना पड़ता है। मुझे तो ऐसा लगता है कि हमें “पीर प्रेशर” में नहीं आना चाहिए और अपनी ज़िन्दगी की कमान अपने हाथ में ले लेना चाहिए। जब भी कभी हम कोई निर्णय नहीं ले पाएं तो उसके लिए प्रॉपर एक्सपर्ट की प्रोफेशनल सलाह पर भरोसा करना चाहिए न कि रास्ते चलते लोगों की कही-सुनी बातों पर। हमारे सुख-दुख, हमारी पीड़ा-परेशानियां, हमारी स्थिति-परिस्थिति केवल हमें ही अच्छे से पता होती हैं, इसलिए किसी और को कोई हक नहीं कि वह हमें और हमारी परिस्थिति को जाने बगैर हमें सलाह दे। हमें चाहिए कि हम उनसे कह दें कि

फ़रिश्ते भी आएं तो इजाज़त से आएं,
ये मेरा वतन है कोई जन्नत नहीं है।

कहने का अभिप्राय है कि हमारी ज़िन्दगी हम जियेंगे, हमारे तरीके से जियेंगे और बिना किसी प्रभाव और दबाव के जियेंगे। भगवान ने हमें फुटबॉलर बनाया है तो हम हमारी ज़िंदगी को फुटबॉल बनाकर लोगों की लातों के हवाले नहीं करेंगे और स्वयं को एक ही बात कहेंगे कि सबसे बड़ा रोग क्या कहेंगे लोग।






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